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Friday, September 11, 2026
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लगता है खातेगांव-कन्नौद विधायक आशीष शर्मा की राजनीति को पनौती लग गई है, वे अपने हाथों से अपना केरियर चौपट करते नजर आ रहे हैं, वो भी क्या करें, सत्ता का खुमार बेचारे को होश में ही नहीं आने देता?

पंडित प्रदीप मोदी _(साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार) 9009597101

देवास जिले में लंबे समय से खातेगांव-कन्नौद विधानसभा क्षेत्र के विधायक आशीष शर्मा चर्चा में बने हुए हैं। मीडिया, सोशल मीडिया पर चलने वाली चर्चाओं पर दृष्टि डाली जाए तो विधायक आशीष शर्मा का राजनीतिक भविष्य अंधकार में हैं और सत्ता के गलियारों में उनके साथ घटित होने वाली घटनाएं भी कुछ इसी प्रकार की चुगली कर रही हैं। आगामी चुनाव के लिए सांगठनिक स्तर पर अपनाए जाने वाले संभावित मापदंडों के हिसाब से भी शायद आशीष शर्मा को चुनाव लड़ने के लायक नहीं माना जा रहा है? यही कारण है कि देवास भाजपा के गलियारों में विधायक आशीष शर्मा का टिकट कटा हुआ माना जा रहा है और क्षेत्र में रही सही कसर उनके अनुभवहीन छिछोरे अनुज रूपेश शर्मा ने पूरी कर दी है, क्षेत्र के 41 प्रतिष्ठित भाजपाइयों को मरा हुआ मान कर। एक बार फिर खातेगांव-कन्नौद विधायक इसलिए चर्चा में आए कि मुख्यमंत्री शिवराज, उन पर सार्वजनिक रूप से नाराज हो गए, विधायक आशीष शर्मा कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री द्वारा भेजी गई लिंक से जुड़े नहीं और एक जगह मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान मंत्री सखलेचा से बतियाते रहे, दोनों ही मौकों पर आशीष शर्मा को मुख्यमंत्री की नाराज़गी का सामना करना पड़ा है। विधायक आशीष शर्मा का यह व्यवहार बताता है कि उन्होंने भी मान लिया है कि आगामी चुनाव में टिकट तो मिलना नहीं है तो फिर मुख्यमंत्री की बातें गंभीरता से सुनने का ढोंग करने की आवश्यकता क्या? यह सही है कि विधायक आशीष शर्मा का यह कार्यकाल बेहद विवादास्पद रहा और इसमें उनके छोटे भाई रूपेश की अभूतपूर्व भूमिका रही हैं। विधायक आशीष शर्मा के इस कार्यकाल में उनके विधानसभा क्षेत्र में अनेक आपराधिक, अनैतिक, विवादास्पद घटनाएं घटी, घटित होती रही और विधायक मौनी बाबा बनकर बैठे रहे, जिससे क्षेत्र में उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा धूल-धूसरित होती रही। नेमावर में एक आदिवासी परिवार को मारकर जमीन में गाड़ दिया गया,पचास दिन बाद उस परिवार के कंकाल निकले,यह मामला प्रदेशभर में चर्चित हुआ और आदिवासियों को भाजपा से बहुत दूर ले जाने का कारण बना, भाजपा की आदिवासी विरोधी छवि बना गया। असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा यह रही कि विधायक आशीष शर्मा ने इस मामले में सहानुभूति के दो शब्द तक नहीं कहे। इसी तारतम्य में उनके विधानसभा क्षेत्र से एक लोकप्रिय आदिवासी युवा नेता को जिला बदर किया गया, लेकिन आशीष शर्मा ने यह तक नहीं पूछा कि इस आदिवासी युवा नेता को क्यों जिला बदर किया गया ? जबकि क्षेत्र में ऐसे अनेक गुंडे-बदमाश है, जो थानों पर पंजीबद्ध है,खुले घूम रहे हैं, जिला बदर उनको किया जाना चाहिए था। इसी कड़ी में क्षेत्र का प्रखर पत्रकार, जो जनता की आवाज को बुलंद किया करता था, उसने अनेक मामले उजागर किए, टैक्स चोरों को शासन के खजाने में पैसा जमा करने के लिए बाध्य किया, उसे जिला बदर कर दिया गया, लेकिन विधायक आशीष शर्मा ने सवाल नहीं किया कि क्षेत्र की जन आवाज को जिला बदर क्यों किया गया? मां नर्मदा की अंतड़ियों को रेत के रूप में खींचकर बेदर्दी के साथ बेचा जाता रहा, लेकिन विधायक आशीष शर्मा ने कभी विरोध नहीं किया, मां नर्मदा पर होते अत्याचार के खिलाफ कभी आपत्ति दर्ज नहीं कराई। एक युवा को कोल्डड्रिंक में जहर देकर मार दिया गया, वह मरने के आठ-दस दिन पहले से इस बात की सोशल मीडिया पर आशंका जताता रहा था, विधायक के भाई पर संदेह व्यक्त करता रहा था, मरते हुए उसके जो वीडियो वायरल हुए, उसमें भी वह कहता रहा कि मुझे विधायक के छोटे भाई ने जहर दिलवाया है। ये सब क्षेत्र की जनता के बीच घटित हुआ है, कोई दबी-छुपी बात नहीं है और इन सब बातों ने मिलकर विधायक आशीष शर्मा की राजनीति के काम डालकर रख दिए हैं। ये सब बातें क्षेत्र से निकलकर सत्ता और संगठन के शीर्ष पर भी पहुंची हैं, शायद यही कारण है कि सत्ता और संगठन संकेत देने लगे हैं कि बस बहुत हुआ आशीष शर्मा। एक तरह से देखा जाए तो क्षेत्र की जनता ने आशीष शर्मा को अपना विश्वास सौंपा था,जिसकी रक्षा वे नहीं कर पाए, जनता के विश्वास की लाज नहीं रख पाए। आशीष शर्मा का अपने भाई पर अवलंबित हो जाना,उनकी राजनीति के लिए घातक साबित हुआ है। विधायक के भाई का क्षेत्र के 41 लोगों के बारे में यह मान लेना कि ये है ही नहीं, बहुत ज्यादा घातक साबित हुआ है, ये 41 लोग क्षेत्र के वे लोग हैं, जो भाजपा को आधार प्रदान करते हैं, भाजपा को अपने कंधों पर लेकर घुमते है, क्षेत्र से आने वाली खबरें चुगली कर रही हैं कि ये 41 ही संगठित हो गए हैं, विधायक आशीष शर्मा के खिलाफ, इन्होंने ठान लिया है कि विधायक के भाई ने जब उन्हें मरा हुआ मान ही लिया है तो फिर वे विधायक की राजनीति को जिंदा क्यों रहने दें? कहा जा रहा है, इन 41 लोगों ने पार्टी के सामने बात रखने का संकल्प ले लिया है कि हम में से किसी को भी टिकट दे दो, लेकिन आशीष शर्मा को नहीं, क्योंकि उनकी छवि पार्टी की प्रतिष्ठा अनुरूप नहीं रह गई है। ***************

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