पंडित प्रदीप मोदी _(साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)_ 9009597101

विचारणीय प्रश्न है और इस पर प्राथमिकता से विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा को धंधा बना चुके लोगों से बच्चों का हक मांगने में पालकों को किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं करना चाहिए, वे दिन लद गए, जब बच्चों को शिक्षा देने वाला पूजनीय हुआ करता था, विद्यालय मंदिर हुआ करते थे, शिक्षक गुरु हुआ करते थे, अब विद्यालय शिक्षा की दुकान है और शिक्षा देने वाले कर्मचारी, व्यापारी, इनसे कैसी सहानुभूति, इनका कैसा सम्मान? जब विद्यालय के दुकानदार अपना हिस्सा, अपना लाभ नहीं छोड़ते तो पालक अपने बच्चों का अधिकार, हिस्सा, लाभ, क्यों छोड़े? बच्चों का प्रावीण्य सूची में आना, उनकी और शिक्षक की मेहनत का परिणाम होता है, यदि बच्चे के साथ शिक्षक मेहनत करता है तो वह इसके लिए विद्यालय से वेतन पाता है और शिक्षक की ही मेहनत को सर्वोपरि बताएं तो सवाल उठता है कि शिक्षक की ही मेहनत सर्वोपरि है तो सभी बच्चे प्रावीण्य सूची में क्यों नहीं आए ?
इसलिए प्रावीण्य सूची में नाम दर्ज कराने वाले बच्चों की अपनी कड़ी मेहनत होती हैं, उस मेहनत के पीछे माता-पिता, अभिभावकों की त्याग तपस्या होती हैं, उस त्याग तपस्या और कड़ी मेहनत को प्रचारित कर लाभ उठाने का शिक्षा की दुकान बन चुके विद्यालयों को क्या अधिकार? आज हर विद्यालय का विज्ञापन बाजार में, मीडिया माध्यमों में देखने को मिल जाएगा, जिसमें उन बच्चों के फोटो होते हैं, जिन्होंने उनके विद्यालय में अध्ययनरत रहते हुए प्रावीण्य सूची में नाम दर्ज कराया है। विद्यालयों ने बच्चों को पढ़ाने का शुल्क लिया है, उन्हें फ्री में नहीं पढ़ाया है, हराम में नहीं पढ़ाया है, पालक ने फीस जमा करने में देर-सवेर की है तो इन्हीं में से कईं बच्चों को भरी क्लास में विद्यालय की ओर से अपमानित भी किया गया है। शुल्क लेकर पढ़ाने वाले विद्यालयों को प्रावीण्य सूची में आने वाले बच्चों के फोटो एवं नाम का उपयोग कर लाभ कमाने का क्या अधिकार? यदि विद्यालय इन प्रतिभावान बच्चों के फोटो एवं नाम का प्रचार कर लाभ कमा रहे हैं तो उस लाभ में से प्रावीण्य सूची में आने वाले प्रतिभावान बच्चों को भी हिस्सा मिलना चाहिए। अधिक से अधिक एडमिशन कबाड़ने के लिए विद्यालय विज्ञापन पर खर्च करते हैं, लेकिन विज्ञापन में जिन बच्चों के नाम एवं फोटो का उल्लेख कर विद्यालय अपने आपको श्रेष्ठ बताते हैं,
उन बच्चों को तो कुछ देते ही नहीं। यदि विद्यालय के प्रचार में बच्चे के फोटो एवं नाम का उपयोग हो रहा है तो उस बच्चे को भी विद्यालय की ओर से सालाना पारिश्रमिक मिलना चाहिए और इसके लिए पालकों ने आगे आना चाहिए, क्योंकि यह उनके प्रतिभावान बच्चे का हक है। इस विचार का जन्म एक अर्थ लोभी विद्यालय संचालक की असंवेदनशीलता से हुआ है और विश्वास है यह विचार निकट भविष्य में अमली जामा अवश्य पहनेगा। देवास के एक विद्यालय से पढ़ाई करके एक बच्ची ने प्रावीण्य सूची में नाम दर्ज कराया, उसके पिता स्ट्रीट वेंडर है विद्यालय उसके फोटो और नाम का उपयोग विगत तीन वर्षों से कर रहा है। वह बच्ची बेहद संघर्षों के बीच फिलहाल आईएएस की तैयारी कर रही हैं, उसी विद्यालय में उसकी छोटी बहन पढ़ रही हैं, जो पढ़ाई में अपनी बड़ी बहन के ही पदचिन्हों पर चल रही हैं। पिता फुटपाथ पर व्यापार करके जैसे-तैसे परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर रहे है। ऐसे में छोटी बेटी के स्कूल की फीस लगभग पच्चीस हजार रूपए बकाया हो गई है, इस बकाया फीस में कोरोना काल की फीस भी शामिल हैं, उल्लेखनीय है, कोरोना काल में स्कूल संचालित नहीं हुए, फुटपाथ पर व्यापार करके जीविका चलाने वाले तबाह हो गए, असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा, उस समय की फीस भी इस बकाया फीस में शामिल हैं। अब बच्ची पर फीस जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है, नहीं तो विद्यालय आने पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, ऐसा कहकर विद्यालय चेतावनी दे रहा है, पिता परेशान हैं कि वह परिवार का पेट पाले या स्कूल की फीस जमा करें, बावजूद पिता ने परिवार का पेट काटकर दिसंबर में ही तीन हजार रुपए जमा किए हैं,
अब फिर बच्ची को परिक्षा से वंचित कर देने का कहकर, फीस जमा कराने का दबाव बनाया जा रहा है, बच्ची के बाल मन पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, वह हीनता के बोध से ग्रस्त होती जा रही हैं, उधर उस बच्ची के शिक्षक, गरीब पिता से मिन्नत कर रहे हैं कि देखना, पैसे को लेकर बच्ची की पढ़ाई प्रभावित ना हो जाए, क्योंकि यह अपनी बड़ी बहन से भी ज्यादा प्रतिभावान बच्ची हैं। कहने का तात्पर्य यदि विद्यालय के संचालक अर्थ पिशाच हो गए हैं तो प्रतिभावान बच्चे एवं उनके पालक, इनके प्रति सह्रदय क्यों रहे? इस मामले में पैसे के लिए प्रतिभावान बच्ची को हीनता का बोध कराने वाले विद्यालय संचालक को सलाह दी जा सकती है कि यदि उसके लिए शिक्षा पुर्णत: धंधा बन चुकी है तो धंधा ही सही, उसी के विद्यालय में अध्ययनरत रहते हुए, उसकी बड़ी बहन ने प्रावीण्य सूची में नाम दर्ज कराया था, जिसका प्रचार कर वह अपने विद्यालय को श्रेष्ठ बता रहा है। उस प्रचार का जो पारिश्रमिक बनता है, उसमें से उसकी छोटी बहन की फीस काट ले, अन्यथा यह छोटी बहन भी अत्यंत प्रतिभावान हैं, यह भी प्रावीण्य सूची में नाम दर्ज कराएगी, इसके भी फोटो लगाकर उसका विद्यालय आगामी वर्षों में अपने आपको श्रेष्ठ बताएगा, उसका अग्रिम पारिश्रमिक समझकर, इस बच्ची की फीस काट ले, लेकिन उसे पैसे के लिए हीनता का बोध ना कराए, पूरी क्लास के सामने जलील ना करें, बाल मन पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं, ये बेटियां हैं, बहुत ज्यादा संवेदनशील होती हैं, इसलिए स्कूल संचालक धैर्य रखें, इस बच्ची के पिता का कहना है वह फीस का एक एक पैसा चुकाएगा, लेकिन कोरोना काल का पैसा नहीं देगा। बात तो सही है, कोरोना काल जैसी विभीषिका की फीस लेना ही बेशर्मी है, स्कूल संचालकों की राक्षसी धूर्तता है। **************
