पंडित प्रदीप मोदी _(साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)_ 9009597101

वैसे तो सारी मध्यप्रदेश भाजपा में ही नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष देखने को मिल रहा है, लेकिन जहां-जहां सिंधिया के साथ भाजपा में आए कांग्रेसी मौजूद है, वहां-वहां भाजपा की स्थिति हास्यास्पद होने की संभावना है। पुरानी पीढ़ी के भाजपाई स्वप्रेरणा से मार्गदर्शक मंडल में जाने को तैयार नहीं, नई पीढ़ी के भाजपाई अब सबकुछ अपने हाथ में लेने को तैयार और उस पर सिंधिया के साथ आए अप्रवासी भाजपाई, भाजपा में जूतम पेजार की संभावना ही संभावना। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा ने पूरे प्रदेश में युवाओं को समर्थ बनाया है, जिम्मेदार, अधिकार संपन्न बनाया है, कहा जा सकता है अध्यक्ष रहते हुए वी.डी. शर्मा ने भाजपा के लिए पीढ़ी परिवर्तन का काम किया है, मार्ग प्रशस्त किया है और उन्हें शाह मोदी का पूरा समर्थन हासिल है, वी.डी. का दूसरा कार्यकाल इस बात का प्रमाण है। पीढ़ी परिवर्तन का घमासान भाजपा में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है, सेवानिवृत्ति की ओर अग्रसर भाजपाई कांग्रेस में जाने की बातें कर रहे हैं और नई पीढ़ी के भाजपाई बुजुर्ग भाजपाइयों को आत्मविश्वास के साथ कहने को तैयार कि जाना हो तो जाओ, यह नये भारत की युवा भाजपा है। इस परिवर्तनीय संघर्षशील वातावरण में भाजपा मठाधीशों के भी हाथपांव फूले हुए हैं, भगवान जाने इस सांगठनिक परिवर्तनीय संघर्ष के आगामी विधानसभा चुनाव में क्या परिणाम आए? जहां तक आदिवासी बहुल धार जिले की बात है तो यहां भाजपा का गुटीय घमासान आत्मघाती होकर भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है, भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है और भाजपा को हास्यास्पद स्थिति में लाकर खड़ा कर सकता है। धार जिले में भाजपा के पुरानी पीढ़ी के वरिष्ठ नेताओं ने सिर्फ अपने हितों का ध्यान रखा, भाजपा के हितों से कभी सरोकार ही नहीं रखा, ये हमेशा आपस में एक दूसरे की लकीर काटने और पीटने की राजनीति करते रहे हैं। रंजना बघेल, छतरसिंह दरबार, विक्रम वर्मा, जैसे नेता सब आपस में उलझकर पार्टी का नुकसान करते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में पूर्व मंत्री रंजना बघेल की जिद के कारण धार जिले में भाजपा दो विधानसभा सीट हारी थी। रंजना बघेल पिछले विधानसभा चुनाव में मनावर से चुनाव लड़ने की जिद छोड़ देती तो भाजपा को दो सीट का नुकसान नहीं होता। गत चुनाव में रंजना बघेल धरमपुरी से चुनाव लड़ लेती और स्व. गोपाल कन्नौज को मनावर से लड़ने देती तो आज धरमपुरी मनावर दोनों विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक होते। धार जिले में भाजपा के वरिष्ठ कहे जाने वाले नेता ही भाजपा के लिए घातक रहे हैं। विक्रम वर्मा, रंजना बघेल, छतरसिंह दरबार जैसे वरिष्ठ कहे जाने वाले भाजपा नेताओं का मनमुटाव सर्वज्ञात है, जगजाहिर है, इनके स्वार्थ, इनकी आत्ममुग्धता, इनमें व्याप्त असुरक्षा के भाव, सब जगजाहिर है और इन सबने मिलकर धार जिले में भाजपा का बहुत नुकसान किया है। धार में भाजपा का सबसे अधिक नुकसान डाक्टर राज बरफा के जिलाध्यक्ष रहते हुआ है, लेकिन पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव यादव ने धार भाजपा को युवा बनाया है, अब मनोज सोमानी धार भाजपा के अध्यक्ष है, मनोज सोमानी संगठन का अनुभव रखते हैं, वे महामंत्री के रूप में संगठन की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और संगठन के लोगों में समन्वय स्थापित करने की योग्यता भी रखते हैं। यहां अध्यक्ष राजीव यादव के पदमुक्त होने को धार में विक्रम वर्मा की राजनीति के समापन से जोड़कर देखा जा रहा है, क्या भाजपा इस बार धार मुख्यालय से राजीव यादव को अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाएगी? क्या भाजपा इस बार विक्रम वर्मा दंपति को चुनाव लड़ने से आराम देगी? ऐसे प्रश्न धार जिले की हर राजनीतिक चौपाल पर बिखरे पड़े हैं। इन प्रश्नों के जन्म का कारण बना है पीथमपुर नगर पालिका का भाजपा के हाथ से निकल जाना। बताया जाता है कि पीथमपुर स्थानीय निकाय चुनाव में संगठन में संजय वैष्णव की नहीं चली तो उन्होंने भाजपा की परिषद नहीं बनने दी। धार के राजनीतिक गलियारों में संजय वैष्णव को विक्रम वर्मा का दत्तक पुत्र बताया जाता है, संजय वैष्णव इतने बड़े समर्थक हैं विक्रम वर्मा के। पीथमपुर स्थानीय निकाय में पराजय के बाद कोई संगठन पदाधिकारी आवेश में कहकर गया है कि संगठन ऐसे सौ विक्रम वर्मा खड़े कर देगा, जिसकी आम जनता में भी चर्चा है, तो क्या सौ विक्रम वर्मा खड़े करने की तैयारी हो गई है? धार भाजपा के वरिष्ठ कहे जाने वाले स्वार्थी नेताओं ने संगठन विस्तार के लिए कभी कुछ नहीं किया, अपने स्वार्थों पर केंद्रित भाजपा नेताओं ने गंधवानी और कुक्षी को कांग्रेस की परंपरागत सीट बना दिया है। उधर बदनावर में अप्रवासी भाजपाई राजवर्धन सिंह दत्तीगांव है, जिन्होंने भाजपा को पशोपेश में डाल रखा है। भाजपा गलियारों में राजवर्धन सिंह दत्तीगांव को अप्रवासी भाजपाई कहा जा रहा है, राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। ये पिछला चुनाव कांग्रेस के बैनर से लड़े थे और भाजपा के पूर्व विधायक भंवरसिंह शेखावत को चुनाव हराया था। देखा जाए तो पिछले विधानसभा चुनाव में राजवर्धन सिंह दत्तीगांव चुनाव जीते नहीं थे, अपितु भंवरसिंह शेखावत को भाजपा नेताओं ने चुनाव हरवाया था राजेश अग्रवाल को बागी उम्मीदवार बनवाकर। कैसे राजेश अग्रवाल को मनाने का ढोंग हुआ था, कैसे राजेश अग्रवाल को निगम अध्यक्ष बनाकर शेखावत को हरवाने का इनाम दिया गया ? सब जनता के सामने है, वही भंवरसिंह शेखावत कांग्रेस में जाने की बात कर रहे हैं। यदि शेखावत बदनावर में कांग्रेस उम्मीदवार बनकर राजवर्धन सिंह के सामने आ गए तो राजवर्धन सिंह का विधायक बनना आसान नहीं रह जाएगा। धार जिले में भाजपा बड़ी विकट स्थिति में है, कह सकते हैं चुनाव से पहले भाजपा को मेंढक तोलने की कसरत करना है और मेंढक तोलना, अर्थात हास्यास्पद स्थिति को प्राप्त हो जाना है। ***†*********
