✍️बेबाक आज़ाद 9993756976

कलम अब कागज की मोहताज नहीं रही, कलम को सोसल मीडिया का सशख़्त माध्यम मिल गया है यही माध्यम एक आम नागरिक को पत्रकार की श्रेणी में ले जाता है। विद्वान पत्रकारों से सुनने मे आया है कि कलम कहीं भी चले, जिसके लिए चली है या जिसको लेकर चली है, शब्द संबंधित तक पहुंच ही जाते है। अभी हाल ही में बेबाक आज़ाद ग्रुप में गरमागरम चर्चा चल रही है ओर चर्चा का विषय है सरदारपुर के बस स्टैंड पर यात्री बसों का नहीं आना और बाहर ही यात्रियों को उतार कर बस का गंतव्य की ओर बढ़ जाना। बस संचालकों की इस मनमानी से यात्री बहुत परेशान हैं, सरदारपुर बस स्टैंड पर पूरी तहसील का सबसे बड़ा मुख्य स्वास्थ्य केंद्र होने से यहां आने वाले मरीज़-यात्री ज्यादा परेशान होते देखे जाते हैं ओर इस परेशानी की जिम्मेदारी का ठीकरा सरदारपुर गांव पर फुट रहा है। बस संचालकों की इस मनमानी की जानकारी सरदारपुर अनुविभागीय अधिकारी, सरदारपुर विधायक , यहीं के पूर्व विधायक यहां तक कि धार जिला आरटीओ को भी है। इस मामले में इनके द्वारा वक्त वक्त पर हाफ हुफ करने से जनता को यह जरूर लगता है कि सब जनता की पीड़ा में साथ हैं लेकिन जिम्मेदारों के हाफ हुफ करने से बस संचालकों में रत्तीभर भी फर्क दिखाई नहीं देता है। बस संचालकों की वजह से उल्टा जनता के सामने संदेश यह जा रहा है कि एसडीएम, यातायात अधिकारी, विधायक और पूर्व विधायक की इन बस संचालकों के सामने कोई बिसात नहीं है, ये तो सिर्फ जनता को दिलासा दे कर जनता हितेषी होने का स्वांग कर रहे हैं। इस पूरे मामले में सरदारपुर के ही एक जागरूक नागरिक दिनेश मिंडा सेन ने सोसल मीडिया पर बस संचालकों के विरुद्ध संग्राम छेड़ दिया है। नित्य सरदारपुर बस स्टैंड पर बसों के लिए यात्रियों को परेशान होते देखना और बेबाक आज़ाद ग्रुप में बस संचालकों की मनमानी, यात्रियों का दर्द ओर अपने विचार साझा करना मिंडा ने अपनी दिनचर्या बना रखा है। बेबाक आज़ाद भी समाजसेवी दिनेश मिंडा के साथ है। उपरोक्त मामले की परिचर्चा में कई और भी ग्रुप के सम्माननीय सदस्य है जो इस परिचर्चा में हिस्सा लेते हैं, अपने विचार साझा करते हैं। चर्चाओं के दौरान अक्सर शासन प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को इंगित करते हुए भी विचार साझा होते हैं। कल ही कि बात करें तो दिनेश मिंडा को एक बस के सरदारपुर के बाहर से निकल जाने व उन्हें गांव के अंदर तक अन्य वाहन से आने से होने वाली परेशानियों को ग्रुप में साझा किया था। अब मैं आप को शब्दों का कमाल बताऊं तो, मिंडा जी ने जिस बस का जिक्र ग्रुप में किया था वह बात उस बस के परिचालक तक थोड़ी देर में ही पहुंच गई, जबकि उस बस का परिचालक उस ग्रुप में हे ही नहीं, फिर भी बात संबंधित तक पहुंच गई। इस बात से यह साबित होता है कि शब्द कहीं भी लिखे हों, किसी के भी बारे में लिखे हों, जिसके बारे में लिखे जाते हैं वह उस तक पहुंच ही जाते है। जिसमे सोसल मीडिया सबसे तेज गति वाला माध्यम साबित हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि उपरोक्त चर्चा की जानकारी बस के परिचालक तक पहुंच गई तो क्या जिम्मेदारों तक नहीं पहुंची होगी, फिर जिम्मेदार अपना कड़क लहजा क्यों नहीं अपनाते है। क्यों खालिपिली हाफ हुफ कर रहे हैं। क्या एसडीएम, यातायात अधिकारी और जनप्रतिनिधि से ऊपर हैं बस संचालक?
