✍️पंडित प्रदीप मोदी (साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार) 9009597101
प्रायः पुलिस अधीक्षकों से पत्रकार सवाल करते हैं तो पुलिस अधीक्षक गोलमाल जवाब देकर सवालों से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं और जवाब भी देते हैं तो ऐसे कि कोई भी जिम्मेदार कटघरे में खड़ा ना हो। पहले तो पत्रकार सवाल करते ही नहीं और करते भी हैं तो इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके सवालों से एसपी साहब नाराज ना हो जाए। ज्यादातर मौकों पर देखा गया है पत्रकारों का अधिकारियों से मिलना खुद के संबंध प्रगाढ़ता के साथ विकसित करने के लिए होता है, जनसमस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए नहीं। पिछले दिनों जिले के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार देवास मुख्यालय पर आकर एसपी सम्पत उपाध्याय से मिले और बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अपराध गुणात्मक रूप से बढ़ रहे हैं, आम आदमी की जान एवं माल खतरे में है। बताया जाता है एएसपी ग्रामीण ट्रेनिंग पर गए हुए थे और अपराधों का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा था इसी संदर्भ में पत्रकार एसपी से मिलने जिला मुख्यालय पहुंचे थे। यह बात अलग है कि आम आदमी अपराध से रूबरू हो तो पत्रकार बंधुओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, खबर लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन जब पत्रकार बंधु भी अपराध से रूबरू होते हैं, प्रभावित होते हैं तो उन्हें ज्ञात होता है, उन्हें पता चलता है कि अपराधों का ग्राफ बढ़ गया है, पत्रकार एसपी से मिलकर बढ़ते अपराध पर चिंता जताते हैं, यहां भी यही हुआ है। पत्रकारों का एसपी से मिलना जनता के लिए नहीं था, पत्रकारों के लिए था। एसपी सम्पत उपाध्याय के बारे में बताया जाता हैं कि वे बेहद सहज-सरल और प्रायोगिक अधिकारी है, उन्हें सच कहने में, सच स्वीकार करने में संकोच नहीं होता। शायद यही कारण रहा कि इस सरल अधिकारी ने सहजता से पत्रकारों के सामने स्वीकार कर लिया कि एक तो पुलिस के पास बल की कमी, उस पर पुलिस को व्यवस्था संभालने के नाम पर इतने काम सौंप दिए जाते हैं कि वह अपना मूल काम अपराधों पर नियंत्रण करना, गंभीरता से कर ही नहीं पाती। एसपी सम्पत उपाध्याय के स्थान पर कोई अन्य अधिकारी होता तो गोलमाल जवाब देकर अपनी विभागीय कमजोरियों को ढांकने की कोशिश करता, लेकिन सम्पत उपाध्याय ने ऐसा नहीं किया है, जो बताता है यह अधिकारी चाहे ज्यादा नहीं, लेकिन थोड़ा तो सच के निकट हैं। क्या मिलने वाले पत्रकारों ने एसपी की भावनाओं को समझने का प्रयास किया, क्या पुलिस विभाग के अभाव, परेशानियों को समझने का प्रयास किया, या फिर एसपी को हताश, कर्तव्य से बचने के लिए बहाने बनाने वाला अधिकारी समझ लिया? ऐसा हो सकता हैं, क्योंकि पत्रकारों को एसपी जैसे अधिकारी से ऐसे जवाब सुनने की आदत ही नहीं। एसपी ने पत्रकारों के सामने यह सोचकर मन खोलकर रख दिया कि शायद ये कलम चलाए और पुलिस विभाग का भला हो, पत्रकार पुलिस विभाग को कटघरे में तो खड़ा करते हैं, लेकिन उनके विभाग की परेशानियों को व्यक्त नहीं करते। पुलिस बल की कमी का रोना हमेशा से रोया जाता रहा है, उस पर एकात्रे (एक दिन छोड़कर आने वाला बुखार) की तरह आने वाले वीआईपी, सामाजिक धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था संभालना, तीज-त्योहार, सबकुछ तो पुलिस के माथे हैं, पूरे पांच साल चलने वाले छोटे-बड़े चुनाव, वे भी पुलिस के माथे ही है, अब इन सब से समय बचे तो पुलिस अपराध पर नियंत्रण करें, एसपी सम्पत उपाध्याय ने क्या गलत कहा? ये छाती पर मूंग दलते वीआईपी, धर्म के नाम पर एक दूसरे को देखकर गुर्राने वाले राजनीति से प्रभावित नागरिकों के जलसे-आयोजन पुलिस को समय दे तो पुलिस अपराध नियंत्रण और जनसुरक्षा की बात करें। एसपी सम्पत उपाध्याय ने सरलता और सहजता से बड़ी बात कह दी है, क्या एसपी से मिलने वाले पत्रकार उनके द्वारा कही गई बात की गंभीरता को समझ पाएंगे? उनके द्वारा कही गई बात के पीछे छुपी पुलिस विभाग की विवशता को समझकर विश्लेषित कर पाएंगे? राजनीति में विचरण करने वाले लोगों ने अपनी-अपनी पसंद के टीआई थानों पर तैनात करा रखे हैं, हर तरफ से तो नेताओं ने पुलिस विभाग को जकड़ रखा है, वह काम करे तो कैसे, निष्पक्ष रहे तो कैसे? सब जानते हैं राजनीतिक लोगों के संरक्षण में जमानेभर के अवैध काम होते हैं, अपराध पलते हैं, पत्रकार बंधु भी जानते हैं, वे जनता के प्रतिनिधि बनकर राजनीतिक लोगों से सवाल क्यों नहीं करते कि ये सब क्या लगा रखा है? यदि राजनीतिक लोग पुलिस को काम ही नहीं करने देंगे तो पुलिस करेगी क्या? बधाई एसपी सम्पत उपाध्याय यह नैसर्गिक सहजता और सरलता बनाए रखना।
