पंडित प्रदीप मोदी _(साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)_ 9009597101

आजाद भारत की राजनीति में जो सबल स्थिति आज भारतीय जनता पार्टी की है,वह कभी कांग्रेस की हुआ करती थी, जैसे आज राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दल मिलकर भारतीय जनता पार्टी का सामना करने के लिए रणनीति बनाते नजर आ रहे हैं, योजना बनाते नजर आ रहे हैं,उसी तरह कभी कांग्रेस के खिलाफ सारे दल मिलकर रणनीति बनाया करते थे, योजना बनाया करते थे,उसमें जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी संघ की राजनंदनी, भाजपा भी शामिल हुआ करती थी। चूंकि कांग्रेस कभी संगठन रही ही नहीं,बस सत्ता से चिपके लोगों की भीड़ थी, कांग्रेस सत्ता से अलग हुई तो सत्ता से चिपकी भीड़, सत्ता जाते ही कांग्रेस के आसपास से छट गई। महात्मा गांधी के अंधे आशीर्वाद से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस का केंद्र रहे और आज का गांधी परिवार जवाहरलाल नेहरू का वंशज हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी की दादी, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के पिता थे। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी को कांग्रेस विरासत में मिली है,इनको भ्रम है कि प्रत्येक कांग्रेसी के लिए ये देव तुल्य है, जबकि वास्तविकता यह है कि कांग्रेस के ढांचे को जिंदा दिखाई देने के लिए सत्ता लोभी चापलूसों को, नेहरू के वंशज गांधी परिवार के नाम की आवश्यकता है, इसलिए कांग्रेसियों के बीच गांधी परिवार को झेला जा रहा है,ढोया जा रहा है, अन्यथा गांधी परिवार के कुलदीपक राहुल गांधी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्थक करके बताया है कि “पूत सपूत तो क्यों धन संचय,पूत कपूत तो क्यों धन संचय”? कड़वा सच कहा जाए तो 15 अगस्त को सत्ता हस्तांतरण दिवस कहा जा सकता है, स्वतंत्रता दिवस नहीं और स्वतंत्रता दिवस कहा जाए तो कैसे? 15 अगस्त 1947 से ही कांग्रेस के पीछे उन लोगों की भीड़ बढ़ती गई, जो 15 अगस्त सत्ता हस्तांतरण दिवस को स्वतंत्रता दिवस मानकर सत्ता सुख भोगने की लालसा रखते थे, सत्ता हस्तांतरण दिवस को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते रहे। लार्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को देश की सत्ता सौंप दी थी,देश उसी को स्वतंत्रता कहता आया है, आजादी कहता आया है। सत्ता पाकर खुश हो जाने वाले लोगों से एक बहुत बड़ा विचारवान वर्ग नाराज रहा है, क्योंकि वह सत्ता हस्तांतरण के साथ-साथ देश को स्वतंत्र भी कराना चाहता था, आजाद भी कराना चाहता था। वह विचारवान वर्ग हमेशा से चाहता रहा कि भारत अपने पुराने वैभव के साथ विश्व बिरादरी में खड़ा हो, सदियों की गुलामी के बोझ से दबे दबे, दब्बू राष्ट्र के रूप में नहीं, लेकिन सत्ता लोभी नेताओं ने भारत को वैसे ही चलाया, जैसा देश छोड़कर जाने वाले अंग्रेज चाहते थे। सत्ता हस्तांतरण को स्वतंत्रता मानने वाले लोगों से असंतुष्ट एवं नाराज विचारवान लोग, जो भारत को उसके पुराने वैभव के साथ विश्व बिरादरी में स्थापित करना चाहते थे, चुप नहीं बैठे, वे धीरे-धीरे अपने स्तर पर अपने लक्ष्य की दिशा में काम करते रहे और आज वे इस स्थिति में आ गए हैं कि भारत को उसके पुराने वैभव के साथ स्थापित कर सके। जी हां यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बात की जा रही हैं, राष्ट्र चिंतन, अनुशासन के लिए प्रसिद्ध, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए दशकों अनुशासनात्मक रूप से साधना की है, संघर्ष किया है और धैर्य रखा है। आज देश के सारे सूत्र संघ के हाथ में हैं, संघ के संस्कारों से संस्कारित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ में हैं। कांग्रेस सहित सारा विपक्ष हताश हैं और संघ अपनी राजनंदनी भाजपा के माध्यम से देश की राजनीति पर आच्छादित है। यदि कांग्रेस सहित विपक्ष सोच रहा है कि देश की सत्ता भाजपा से हासिल कर लेगा तो वह, खयाली पुलाव पका रहा है,मन के लड्डू खा रहा है। अब संघ भाजपा के हाथ से सत्ता छीन लेना आसान नहीं है, संघ एक दीर्घकालीन रणनीति और योजना लेकर चलने वाला, काम करने वाला, अनुशासन से अलंकृत संगठन है। संघ की दीर्घकालीन रणनीति में सिर्फ और सिर्फ उसके सपनों का भारत है, जिसका निर्माण सन् 2014 से नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही प्रारंभ हो गया था। यदि संघ के आत्मविश्वास को परखना है तो सन् 2014 में मोदी सरकार बनते ही संघ नेता राम माधव द्वारा दिए गए उस बयान पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि अब पचास साल तक अन्य राजनीतिक दल भूल जाए कि उनकी सरकार आएगी। सन् 2014 के अखबार खंगाले जाएंगे तो दीर्घकालीन रणनीति से उपजे आत्मविश्वास पर आधारित राम माधव का यह बयान मिल जाएगा। संघ, सेवा, अनुशासन, त्याग, समर्पण और राष्ट्र भक्ति का पर्याय है तथा भाजपा संघ के संरक्षण में ही सत्ता के खेल खेलती हैं,अब बताओ ऐसे संगठन से, वे राजनीतिक दल कैसे पार पा सकते है, जो शुद्ध रूप से सत्ता स्वार्थ के लिए एक जगह इकट्ठे हुए हो? ************
