
*पंडित प्रदीप मोदी* (साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)*9009597101*
एक परेशान लड़के को मेरे स्नेही मेरे पास लाए, कहा गुरुजी इसकी समस्या सुन लो, लड़के ने बताया कि मेरा परिवार शादी में गया था, लौट कर देखा तो तहसीलदार मैडम हमारा मकान सील कर गई है। मैंने पूछा क्यों? तो बताया एमपीईबी ने एक लाख बीस हजार रुपए का बिल दिया था। मैंने कहा कार्रवाई जायज है, लेकिन तरीका गलत है। फिर पूछा तुम्हें कोई नोटिस दिया गया था, तो बताया कि मकान सील करने के एक दिन पहले घर के एक बच्चे को कोई नोटिस पकड़ा गया था और आज घर सील मिला। मैंने पूछा बिल की राशि जमा करने का क्या? गुरुजी अभी बीस हजार जमा करा देता हूं, बाकी तीन चार महीने में सारा पैसा जमा करा दूंगा, मैंने तहसीलदार मैडम पूनम तोमर को फोन लगाया, उन्होंने बताया मैंने कोई मकान सील नहीं किया, उन्हें बताया कि मामला एमपीईबी का है तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मार्च महीने में एमपीईबी के वसूली करने वालों को स्वत: तहसीलदार के पावर प्राप्त हो जाते हैं, क्योंकि वे भी वसूली शासन के खजाने के लिए ही करते हैं। एमपीईबी की कार्रवाई के बाद इस परिवार ने अपने रिश्तेदारों के यहां रात काटी, मोहल्ले में अपमानित हुआ, अपनी आर्थिक बदहाली पर शर्मिन्दा हुआ और प्रशासन की असंवेदनशील कार्रवाई पर सहम कर रह गया। नियम से नोटिस देकर समझाया जाता, समय दिया जाता तो यह परिवार मोहल्ले में अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ भी करता और बिल जमा करता , लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। कार्रवाई एमपीईबी ने की और इसमें जनता के बीच नकारात्मक छवि तहसीलदार पूनम तोमर की बनी है, पीड़ित एमपीईबी कार्यालय जाता है तो उसे जवाब दिया जाता है कि अब जो भी करेंगी, तहसीलदार मैडम ही करेंगी। देखने में यही आया है कि जिला प्रशासन में बैठे उच्चाधिकारियों ने इस महिला अधिकारी के दबंग कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व का शोषण ही किया है। सार्वजनिक तौर पर की जाने वाली मैदानी कार्रवाईयों के लिए इस अधिकारी को उच्चाधिकारियों से आदेश मिला है, अपेक्षित सहयोग एवं हौसला बढ़ाने वाली प्रशंसा नहीं। जनता, पत्रकार,सबकी नाराजगी इस अधिकारी ने झेली है और वरिष्ठाधिकारियों के आदेशों का पालन किया है। पिछे निगाह डाले तो ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां वरिष्ठाधिकारियों ने नेताओं को खुश करने के लिए तहसीलदार पूनम तोमर को कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं और इस दबंग महिला अधिकारी ने उन आदेशों का पालन किया है। कोरोना काल में विकास नगर का श्मशान हटाना, जिला प्रशासन का सबसे घटिया, राक्षसी, असंवेदनशील कृत्य था, क्योंकि वह समय ऐसा था,जब लाशें जलाने को श्मशान कम पड़ रहे थे और यह श्मशान कोई एक दो साल में अस्तित्व में नहीं आया था, अपितु दशकों से मौजूद था और यहां लाशों के अंतिम संस्कार होते थे। तब भी तहसीलदार पूनम तोमर को आगे किया गया और यह अधिकारी जनता के बीच निंदा की पात्र बनी थी। ऐसे ह्रदय विदारक समय में श्मशान हटाने का विरोध,आपदा में धन कमाने का अवसर ढूंढ लेने वाले सत्तारूढ़ पार्टी के किसी भी नेता ने नहीं किया था, जिससे स्पष्ट होता है कि बीच कोरोना काल में प्रशासन ने श्मशान हटाने का कृत्य, सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को खुश करने के लिए किया था और जन निंदा का स्वाद तहसीलदार पूनम तोमर ने चखा था। एक मामला और था, जब पूनम तोमर उज्जैन रोड क्षेत्र के मदरसे में वसूली के लिए गई थी और मुस्लिम कौम के रहनुमा नुमाइंदे ने शहर की फिजा खराब करने की धमकी दे दी थी,तब जनता ने वोट की राजनीति करनेवाले नेता और नेताओं के लिए अफसरी करने वाले अधिकारियों को तो डरते देखा, लेकिन इस अधिकारी को डरते नहीं देखा। एक मिठाई की दुकान पर कार्रवाई के दौरान भी एक भाजपा नेता ने इस अधिकारी पर दबाव बनाने की कोशिश की, इस अधिकारी ने स्पष्ट कह दिया, मैंने कलेक्टर के आदेश का पालन किया है, जो भी बात करना है कलेक्टर से करो। ऐसे बहुत से मामले रहे, जो जन विरोधी थे, विवादास्पद थे, असंवेदनशील थे, उनमें इस अधिकारी को आगे किया गया है। ऐसे ही एमपीईबी वाले जनता से बिजली बिल की वसूली में तहसीलदार पूनम तोमर के नाम का उपयोग कर रहे हैं और निंदा की पात्र यह अधिकारी बन रही हैं।
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