पंडित प्रदीप (साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)9009597101

जो नहीं होना था, वह हो गया, राजनीति के संत पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे पूर्व मंत्री दीपक जोशी, भाजपाई से कांग्रेसी हो गए। दीपक जोशी को भान ही नहीं है कि उन्होंने क्या किया है? उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत कांग्रेसी होकर, अपने स्वर्गीय पिता की प्रतिष्ठा को आहत ही नहीं किया, अपितु मध्यप्रदेश की भाजपा राजनीति में से अटल बिहारी वाजपेई की धारा, विचारधारा को खत्म करने का कारण भी बने हैं। इस बात को समझने के लिए भाजपा के संघर्ष दिनों में झांकना होगा। भारतीय जनता पार्टी में प्रारंभ से दो धारा बहती आई है, जो दो विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती रही, विचारधारा दोनों धाराओं की हिन्दुत्व की ही पोषक रही, लेकिन एक धारा सही को सही, गलत को गलत कहते हुए नरम हिन्दुत्व की पक्षधर रही तो दूसरी, सिर्फ और सिर्फ हिन्दुत्व की बात करते हुए उग्र हिन्दुत्व की। भाजपा में नरम हिन्दुत्व वाली धारा का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने किया और उग्र हिन्दुत्व वाली धारा का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी ने किया। इन दो धारा, दो विचारधारा के चलते भाजपा में स्वाभाविक तौर पर दो गुट अस्तित्व में आ गए, अटल गुट, आडवाणी गुट। जहां तक मध्यप्रदेश की बात है तो यहां आडवाणी गुट का प्रतिनिधित्व पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा किया करते थे और अटल गुट का प्रतिनिधित्व राजनीति के संत कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कैलाश जोशी किया करते थे। वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सुंदरलाल पटवा के चेलों में से आते हैं, उन्होंने अपने डेढ़ दशक के कार्यकाल में कैलाश जोशी समर्थकों को चुन-चुनकर हाशिए पर पटका है, चलन से बाहर करने की कोशिश की है, लेकिन पूर्व मंत्री दीपक जोशी पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे होने के नाते भाजपा में कैलाश जोशी की विचारधारा, उनकी विरासत का प्रतिनिधित्व करते थे, प्रदेशभर में फैले अटल जी, कैलाश जी में विश्वास रखने वाले भाजपाई दीपक जोशी से प्रेरणा ग्रहण कर सकते थे, भाजपा में ही रहकर अटल जी, कैलाश जी के मूल्यों के लिए लड़ सकते थे, संघर्ष कर सकते थे, लेकिन ये क्या, कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी तो रणछोड़ साबित हुए। दीपक जोशी ने कल्पना करना थी कि यदि सुंदरलाल पटवा के चेले शिवराज विरोधियों के प्रति इतने निर्मोही है तो खुद सुंदरलाल पटवा कितने रहे होंगे? क्या उन्होंने कम परेशान किया होगा दीपक जोशी के पिता कैलाश जोशी को? लेकिन उन्होंने भाजपा नहीं छोड़ी, रणछोड़ साबित नहीं हुए। दीपक जोशी कांग्रेस में आए तो आए, अपने पिता की तस्वीर भी भाजपा से कांग्रेस में ले आए, कम से कम कैलाश जोशी की तस्वीर तो भाजपा में छोड़ आते, उनके अनुयाई, उनमें विश्वास करने वाले भाजपाई कैलाश जोशी की तस्वीर से काम चला लेते। माफ करना अपने पिता की तस्वीर लेकर कांग्रेस कार्यालय पहुंचे दीपक जोशी हास्यास्पद नजर आए हैं, इससे यह भी साबित हुआ है कि पूर्व मंत्री दीपक जोशी का राजनीति में अपना कमाया कुछ नहीं है, उन्होंने राजनीति में सिर्फ पितृ कमाई खर्च की है। राजनीति में दीपक जोशी की सिर्फ इतनी पहचान है कि वे राजनीति के संत कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे हैं और यह पहचान भी भाजपा में रहते हुए ही सम्मान की कारक थी, कांग्रेस में नहीं। दीपक जोशी क्या समझते हैं, जिस उत्साह से उन्हें कांग्रेस में शामिल किया गया है, उसी उत्साह से कांग्रेस में सिर माथे बिठाया जाएगा? यदि दीपक जोशी ऐसा सोचते हैं तो गलत सोचते हैं, क्योंकि कांग्रेस के लिए दीपक जोशी को कांग्रेस में शामिल करना महत्वपूर्ण था, उन्हें कांग्रेस में महत्वपूर्ण बनाकर रखना, महत्वपूर्ण नहीं रहेगा। दीपक जोशी ने कांग्रेस का दामन थाम कर भाजपा में से एक धारा, एक विचारधारा का खात्मा कर दिया। दीपक जोशी राजनीति में पितृ कमाई खर्च करते रहे और अंत में पिता की राजनीतिक संतत्व से अलंकृत विरासत को भी बंगे लगाकर कांग्रेसी हो गए।
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