*पंडित प्रदीप मोदी* (साहित्यकार/स्वतंत्र पत्रकार)*9009597101*

23 फरवरी 2023 गुरूवार को मेरे पारिवारिक जीवन का एक और प्रेरक स्तंभ ढह गया, देह से दिव्य हो गया, मेरे फूफाजी परम पूजनीय प्रातः स्मरणीय आदर्श शिक्षक श्री रामचन्द्र जी दुबे धार,दिव्य ज्योति में लीन हो गए। मैं अकेला ही नहीं, मेरे जैसे सैकड़ों लोग उनसे प्रेरणा ग्रहण किया करते थे, अपने-अपने आत्मविश्वास को पोषित किया करते थे, फूफाजी श्री रामचन्द्र जी दुबे धैर्य, आत्मविश्वास, अपनत्व, संवेदना और अनुशासन जैसे अध्यायों से सुसज्जित एक पूरा ग्रंथ थे,जिन लोगों ने तन्मयता से इस ग्रंथ को पढ़ा है,उनका जीवन बन गया है। रहे होंगे परिवार में कोई वैचारिक मतभेद, मैंने अपने जीवन की चौदह-पंद्रह वर्ष की उम्र में फूफाजी जैसे महामना के पहली बार दर्शन किए। यह सुन-सुनकर बड़ा हुआ धार में मेरी बुआ है, तीन भाई हैं, लेकिन सबको देखा चौदह-पंद्रह वर्ष की उम्र में। मैंने देखा फूफाजी श्री रामचन्द्र जी दुबे का अनुशासन स्कूल और घर तक ही सीमित नहीं था, अपितु मोहल्ले में भी फूफाजी के अनुशासन को प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जा सकता था। मोहल्ले में इधर-उधर बिखरे छोटे से लगाकर बड़े बच्चे, सब यह कहते हुए कि सर आ रहे हैं, वक्र रेखा से सरल रेखा में आ जाया करते थे,बड़े भी फूफाजी से सोच-समझकर ही बात किया करते थे। फूफाजी की अनुशासनात्मक रौबीली जीवनशैली आखरी समय तक कायम रही, आज्ञाकारी बेटे बहू,उन पर जान छिड़कने वाले पोते-पोतियों के बीच फूफाजी खुश थे, लेकिन बुआजी की कमी हमेशा महसूस करते रहे। मेरी बुआजी ममता का सागर थी, वे फूफाजी पर शुरू होकर फूफाजी पर खत्म हो जाती थी, बुआजी का मन, मनोवृत्ति सब सब बाल सुलभ, लेकिन परिवार का केंद्र बिंदु थी बुआजी और यही सब फूफाजी को बुआजी पर समर्पित कर देता था, फूफाजी बिना बुआजी के रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे,विधि की विडंबना, उन्हें जीवन के आखिरी लगभग सात साल बुआजी के बिना गुजारने पड़े। पहली बार बुआ-फूफाजी और अपने भाईयों को देखा,तब बुआ का परिवार शनि गली मारुति पूरा धार में निवास किया करता था। धीरे-धीरे फूफाजी का चुंबकीय व्यक्तित्व आकर्षित करता गया और मैं उनका होता गया। मां और बुआ सन् 2016 में लगभग दो तीन माह के अंतर से स्वर्ग सिधार गई, सन् सोलह में मेरे सिर से दो-दो मां का साया उठ गया था। यह दोनों परिवारों पर बहुत बड़ा वज्रपात था, बुआ का जाना फूफाजी को तोड़ गया और मां का जाना मुझे। लंबे समय से फूफाजी से नहीं मिल पाया, यह मलाल मृत्यु पर्यन्त रहेगा। फूफाजी शिक्षक थे, आदर्श शिक्षक थे और जीवन पर्यन्त शिक्षक रहे, शिक्षकीय व्यक्तित्व के स्वामी थे मेरे धार वाले फूफाजी। भाई दिनेश दुबे और मैं हम उम्र है,अजय दुबे, कमल दुबे छोटे हैं। दिनेश दुबे धार जिले के विद्यालय में प्राचार्य है,अजय अकोला महाराष्ट्र की किसी प्रायवेट कंपनी में विशेषज्ञ है और कमल धार में पूर्व पार्षद होकर धार बार एसोसिएशन का अध्यक्ष है। वैसे तो सारा परिवार ही फूफाजी से गहराई से जुड़ा था, लेकिन मेरा भाई दिनेश दुबे फूफाजी से विशेष जुड़ाव रखता था, मेरे भाई को सहज होने में समय लगेगा। शैक्षणिक जीवन में चाहे फूफाजी ने बच्चों को शिक्षक बनकर अनुशासन में रखा हो, लेकिन बड़े होने पर बेटों को मित्रवत ही रखा, उनसे विचार विमर्श किया,बहस की और उन्हें अपने मत-मतांतर रखने का अधिकार दिया। ऐनी से लगाकर सत्यम तक, सारे पोते-पोतियां बड़भागी है, जिन्होंने फूफाजी को मित्र रूप में देखा, फूफाजी अनुशासन के मामले में क्या थे, दिनेश और अजय ज्यादा बेहतर तरीके से बता सकते हैं,कमल छोटा एवं नटखट होने के नाते शिक्षक पिता की अनुशासनात्मक फटकार से कईं बार बच जाया करता था। फूफाजी के पास आत्मविश्वास के साथ हर समस्या का समाधान हुआ करता था। परिवार फूफाजी की दुनिया थी, फूफाजी देह से लीन हुए हैं, बाकी आत्मा से तो वे अपने बेटे-बहुओं,पोते-पोतियों और स्नेहियों में बिखर गए हैं आशीर्वाद बनकर। हम सब उन्हें हमेशा महसूस करते रहेंगे, उनके बताए मार्ग को प्रशस्त करते रहेंगे। आदर्श शिक्षक मेरे फूफाजी, श्री रामचन्द्र जी दुबे धार को विनम्र श्रद्धांजलि।
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