पंडित प्रदीप मोदी _(साहित्यकार स्वतंत्र पत्रकार)_

देखा जाए तो मैं देवास का जबरिया पत्रकार हूं, जो जबरन पत्रकारिता की दुनिया में आ गया है, वैसे मूल रूप से मैं कवि हूं, साहित्यकार हूं, पत्रकार तो दुर्घटनावश बन गया हूं। अनेक मंचों से कविता पाठ किया है, लेकिन कमंडल उठाने की प्रकृति कभी नहीं रही, इसलिए कवि सम्मेलन मंचों से स्वत: दूरी बढ़ती गई, क्योंकि कवि सम्मेलनों के मंच पर लंबे समय से परंपरा बन चुकी है कि जो कवि, ठेकेदार कवियों के कमंडल उठाएगा मंच उसे ही मिलेगा। कह सकता हूं, मां सरस्वती ने अपने इस बेटे को अतिरिक्त आशीर्वाद से उपकृत किया है और यह बात पेशेवर कवि भी जानते हैं, पत्रकार भी जानते हैं। साहित्यिक क्षेत्र से जुड़ी बातें फिर कभी करेंगे, अभी सिर्फ पत्रकारिता से जुड़ी बातें ही करते हैं। मैं सन् अस्सी के दशक में उज्जैन से शिक्षा ग्रहण कर देवास आया, उज्जैन मेरा ननिहाल है और ननिहाल क्या, गुरुकुल है, गुरुकुल। जब शिक्षा ग्रहण कर देवास आया तो देवास में कांग्रेस के चंद्रप्रभाष शेखर की राजनीति चर्मोत्कर्ष पर थी तथा देवास का प्रेस जगत दो गुटों में बंटा हुआ था, यशवंत खड़के गुट, मोहन सिंह बैंस गुट। यशवंत खड़के परमात्मा को प्यारे हो गए और मोहन सिंह बैंस हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास भुगत रहे हैं। देवास का मूल निवासी हूं और देवास को चार दरवाजों के अंदर सिमटा देखा है, कौन सा राजनीतिक पौधा कैसे वृक्ष बना है और कौनसा हाकर कैसे पत्रकार बना है, सब जानता हूं।
देवास में पत्रकारिता कर रहे बच्चे पिछले दो-तीन सालों से मेरा नाम जान रहे हैं कि यह फच्चर बीच में से कहां उग आया तो बताता चलूं देवास के पत्रकारिता जगत के लिए मैं पुराना फच्चर हूं, जो यशवंत खड़के और मोहन सिंह बैंस गुट के बीच सन् 1980 के दशक के प्रारंभ में ही उग आया था। जैसा कि उज्जैन से शिक्षा ग्रहण कर देवास आया तो देवास में चंद्रप्रभाष शेखर के जलवे थे और जनता की भावनाओं को कोई पत्रकार शासन-प्रशासन के सामने रखने को तैयार नहीं था, एक दो पत्रकारों को छोड़कर, सब के सब जन संपर्क कार्यालय से जारी होने वाले प्रेस नोट पर आश्रित थे, जो दो-चार लिखते भी थे तो उनके लेखन में जनहित की बजाय, स्वहित ज्यादा होता था। ऐसे में मैंने एक आर्टिकल लिखा और स्थानीय अखबार में दिया, आर्टिकल चंद्रप्रभाष शेखर के खिलाफ था, दो-तीन दिन प्रतीक्षा की आर्टिकल नहीं छपा, मैंने सोचा अखबार मालिक कांग्रेसी है, शायद इसलिए नहीं छापा होगा, मैंने वही आर्टिकल अन्य अखबार में दिया, जिसका मालिक भाजपाई मानसिकता का था, उसमें भी वह आर्टिकल नहीं छपा, दोनों चंद्रप्रभाष शेखर के पास जा पहुंचे और लिफाफा ले आए। मुझे समझ आ गया कि देवास में पत्रकारिता नहीं हो रही है, भाटगिरी हो रही है और मैंने तब से ही जनभावना को अभिव्यक्त करने का संकल्प लें लिया, जिसका निर्वाह आज तक कर रहा हूं। मैंने पर्चें छपवाकर अपनी बात जनता के बीच लाना प्रारंभ कर दिया, जागरूक युवा मंच के पर्चें आज भी लोगों ने संभालकर रखें होंगे। उसके बाद अनेक स्थानीय साप्ताहिक दैनिक अखबारों के संपादन मैंने किए, जनजागरण हेतु सड़क पर सत्याग्रह आंदोलन किए। स्वर्गीय श्रीमंत महाराज तुकोजीराव पवार उम्र में मुझसे छह-सात माह छोटे थे, मेरा जन्म फरवरी का है और उनका नवंबर का, वर्ष एक ही है तथा हम दोनों लगभग साथ ही सार्वजनिक जीवन में आए। डाक्टर बबुल जोशी सन् 1989 में जनता दल से चुनाव नहीं लड़ते तो शायद मैं महाराज तुकोजीराव पवार का सबसे विश्वसनीय सहयोगी भाजपाई होता, क्योंकि उस समय चंद्रप्रभाष शेखर के खिलाफ मेरी मुखरता ने भाजपा को बहुत लाभान्वित किया था, उसी चुनाव के बाद राजनीति से उच्चाटन हो गया, नफरत सी हो गई। उस समय भी देवास पत्रकारिता की हालत आज से बेहतर नहीं थी और गुटों के बीच एक-दूसरे को निपटाने के लिए मेरे नाम का उपयोग होता रहा है।
एक समय तो देवास प्रेस क्लब अध्यक्ष असलम खान (देवास दर्पण वाले) के नेतृत्व में दर्जनों पत्रकार मेरी गिरफ्तारी की मांग करने कलेक्टर के पास पहुंच गए थे, तब कलेक्टर मिथन सिंह और एसडीएम ए.के. सिंह थे, जैसे चंद्रमौली शुक्ला के समय प्रशासन निगमायुक्त विशाल सिंह के आसपास घूमा करता था, तब एक.के. सिंह के आसपास घूमा करता था। जब पत्रकार मेरी गिरफ्तारी की मांग करने गए तो एसडीएम ए.के. सिंह ने कलेक्टर मिथन सिंह के कान में कहा था, इन बेवकूफों को समझाया जा सकता है, पंडित प्रदीप मोदी जैसे समझदार को समझाना मुश्किल है, हमें इनके लफड़ों में नहीं पड़ना, ये पत्रकारों के आपसी लफड़े है। उस समय कलेक्टर मिथन सिंह ने यह कहकर पत्रकारों को बेरंग लौटा दिया था कि पत्रकारों के आपसी झगड़ों में हमें मत घसीटों। घटनाक्रम यह था कि उस समय नेता-पत्रकारों ने मिलकर कृष्णपाल सिंह सिसौदिया जैसे ईमानदार निगम आयुक्त का ट्रांसफर करा दिया था, ट्रांसफर रुकवाने के लिए समाजसेवी गणेश शंकर विजयवर्गीय आमरण अनशन पर बैठे थे और मैंने नेता-पत्रकारों के खिलाफ नगर में एनाउऊंसमेंट किया था, जिससे सब पत्रकार नाराज थे। उसके बहुत बाद में सन् 1999 में इंदौर जीतू भाई सोनी के अखबार संझा लोकस्वामी में नौकरी करने चला गया, एक दो साल नौकरी की और छोड़कर आ गया, बीच में संन्यास आश्रम चला गया, सद्गुरु के आदेश से पुनः गृहस्थाश्रम में आया, जीविका के लिए फिर संझा लोकस्वामी में नौकरी करने लगा। देवास को लेकर लोकस्वामी में लिखना चाहता तो संपादक नहीं लिखने देता, देवास प्रतिनिधि की संपादक से जाने क्या सांठगांठ थी? उल्लेखनीय है देवास प्रतिनिधि मिलावटखोर व्यापारी था और उसने अपने धंधे की आड़ के लिए संझा लोकस्वामी अखबार ले रखा था। धीरे-धीरे देवास से मेरा ध्यान हटता चला गया, अखबार में प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें पढ़ लेता, अखबार छोड़ देता, देवास की खबरों से नाता ही नहीं रखा था मैंने, लेकिन 30 नवंबर सन् 2019 को हनीट्रेप मामला उजागर करने पर तत्कालीन कमलनाथ सरकार जीतू भाई सोनी और उनके परिवार पर टूट पड़ी, पुलिस ने कैंप लगाकर उन पर मुकदमें लादे, सम्मानित पत्रकार को एक रात में माफिया घोषित कर दिया, एक लाख साठ हजार का ईनामी बनाकर, एनकाउंटर की तैयारी कर ली थी, किसी माई के लाल ने सवाल नहीं किया कि दशकों से पत्रकारिता करने वाले सम्मानित पत्रकार जीतू भाई सोनी एक रात में माफिया कैसे हो गए, लेकिन मैंने किए। उस घटना के बाद संझा लोकस्वामी अखबार बंद हो गया और तब से मैं देवास में हूं तथा देवास का नागरिक होने के नाते, देवास के नागरिकों की ओर से जनप्रतिनिधि, अधिकारी और पत्रकारों से सवाल कर रहा हूं। इसी बीच श्रीकांत उपाध्याय देवास प्रेस क्लब का अध्यक्ष बना, मुझे आश्चर्य हुआ यह श्रीकांत कब से पत्रकार हो गया? यह तो मेडिकल चलाया करता था। इसके अध्यक्ष बनते ही मैंने सोशल मीडिया पर लिख दिया था कि श्रीकांत एक स्वार्थी व्यक्ति हैं और स्वार्थी व्यक्ति नेतृत्व के योग्य नहीं होता। आरोप लगे कि श्रीकांत ने चुनाव जीतने के लिए प्रेस क्लब के कुछ सदस्यों को पैसे बांटे। पुनः अध्यक्ष बनने के लिए श्रीकांत उपाध्याय नए सदस्य बनाने लगा तो वर्तमान अध्यक्ष तथा तत्कालीन उपाध्यक्ष अतुल बागलीकर ने मेरा नाम आगे बढ़ा दिया कि तुम्हारे सदस्य बनेंगे तो हमारे भी सदस्य बनेंगे और पहला नाम पंडित प्रदीप मोदी का होगा। मेरा नाम सुनते ही श्रीकांत उपाध्याय बिफर पड़ा, भड़क गया और कहने लगा कि नए सदस्य कोई नहीं बनेंगे, मेरे भी नहीं, तुम्हारे भी नहीं। नहीं तो प्रेस क्लब उपाध्यक्ष शेखर कौशल ने तो यहां तक कह दिया था कि दादा आपका फार्म अतुल के पास रखा है। एक और पत्रकार हैं उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि आपको सदस्यता नहीं देंगे तो मैं आंदोलन करुंगा, वे उपाध्यक्ष बना दिए गए हैं,
कहने का तात्पर्य देवास प्रेस क्लब में दशकों से मेरा नाम स्वार्थ साधने का साधन बना हुआ है। मेरी देवास प्रेस क्लब का सदस्य बनने में कभी रुचि नहीं रही, आज भी नहीं, लेकिन शिकायत जरुर है कि इतने सारे बच्चे पत्रकारिता कर रहे हैं, इनको प्रेस क्लब की सदस्यता प्रदान क्यों नहीं की जाती? प्रेस क्लब, पत्रकारिता करने वाले सभी साथियों को सदस्यता प्रदान करें, अन्यथा नगर को बताया जाएगा प्रेस क्लब में कौन हाकर है, कौन एजेंट है, कौन दलाल है और कौन दलालों का मोहरा है? **************
